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दुष्यंत कुमार की शायरी

प्रेरक शायरी

पीर पर्वत सी...

​​​हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए​।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी​,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए​।

​हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गाँव में​,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए​।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं​,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए​।

​मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही​,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए​।

~ दुष्यंत कुमार
एडमिन द्वारा दिनाँक 19.10.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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