होम / हिंदी उर्दू ग़ज़ल / तक़रार क्या करूं

तक़रार क्या करूं...


( एडमिन द्वारा दिनाँक 05.06.16 को प्रस्तुत )
Advertisement

जो कुछ कहो क़ुबूल है तक़रार क्या करूं,
शर्मिंदा अब तुम्हें सर-ए-बाज़ार क्या करूं,

मालूम है की प्यार खुला आसमान है,
छूटते नहीं हैं ये दर-ओ-दीवार क्या करूं,

इस हाल मे भी सांस लिये जा रहा हूँ मैं,
जाता नहीं हैं आस का आज़ार क्या करूं,

फिर एक बार वो रुख-ए-मासूम देखता,
खुलती नहीं है चश्म-ए-गुनाहगार क्या करूं,

ये पुर-सुकून सुबह ये मैं ये फ़ज़ा शऊर,
वो सो रहे हैं अब उन्हें बेदार क्या करूं।

- अनवर शऊर



Advertisement

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

Advertisement
Ads from AdNow
loading...

« पिछला पोस्ट अगला पोस्ट »