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तेरी आँखों के सिवा

( एडमिन द्वारा दिनाँक 28-08-2016 को प्रस्तुत )
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मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात,
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है,
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात,
तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है।

~ फैज़ अहमद फैज़
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