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शायद ये वक़्त

( एडमिन द्वारा दिनाँक 19-10-2016 को प्रस्तुत )
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शायद ये वक़्त हमसे कोई चाल चल गया,
रिश्ता वफ़ा का और ही रंगों में ढल गया,
अश्क़ों की चाँदनी से थी बेहतर वो धूप ही,
चलो उसी मोड़ से शुरू करें फिर से जिंदगी।

शायद ये वक़्त शायरी
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