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इश्क़ ही ख़ुदा...


( एडमिन द्वारा दिनाँक 21.10.16 को प्रस्तुत )
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जो मिला मुसाफ़िर वो रास्ते बदल डाले,
दो क़दम पे थी मंज़िल फ़ासले बदल डाले।

आसमाँ को छूने की कूवतें जो रखता था,
आज है वो बिखरा सा हौंसले बदल डाले।

शान से मैं चलता था कोई शाह कि तरह,
आ गया हूँ दर दर पे क़ाफ़िले बदल डाले।

फूल बनके वो हमको दे गया चुभन इतनी,
काँटों से है दोस्ती अब आसरे बदल डाले।

इश्क़ ही ख़ुदा है सुन के थी आरज़ू आई,
ख़ूब तुम ख़ुदा निकले वाक़िये बदल डाले।




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