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मैं खिल नहीं सका

( एडमिन द्वारा दिनाँक 21-06-2015 को प्रस्तुत )
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मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला,
साक़ी मिरे मिज़ाज का मौसम नहीं मिला ।

मुझ में बसी हुई थी किसी और की महक,
दिल बुझ गया कि रात वो बरहम नहीं मिला ।

बस अपने सामने ज़रा आँखें झुकी रहीं,
वर्ना मिरी अना में कहीं ख़म नहीं मिला ।

उस से तरह तरह की शिकायत रही मगर,
मेरी तरफ़ से रंज उसे कम नहीं मिला ।

एक एक कर के लोग बिछड़ते चले गए,
ये क्या हुआ कि वक़्फ़ा-ए-मातम नहीं मिला ।

~ साकी फ़ारूक़ी
मैं खिल नहीं सका शायरी
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