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निगाहों के तक़ाज़े चैन

( एडमिन द्वारा दिनाँक 25-06-2015 को प्रस्तुत )
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निगाहों के तक़ाज़े
चैन से मरने नहीं देते,
यहाँ मंज़र ही ऐसे हैं
कि दिल भरने नहीं देते,

क़लम मैं तो उठा के
जाने कब का रख चुका होता,
मगर तुम हो कि क़िस्सा
मुख़्तसर करने नहीं देते ।

निगाहों के तक़ाज़े चैन शायरी
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