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ज़माने भर की निगाहों में

( एडमिन द्वारा दिनाँक 25-06-2015 को प्रस्तुत )
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ज़माने भर की निगाहों में
जो खुदा सा लगे,
वो अजनबी है मगर
मुझ को आशना सा लगे,
न जाने कब मेरी
दुनिया में मुस्कुराएगा,
वो शख्स जो ख्वाबों
में भी खफा सा लगे ।

ज़माने भर की निगाहों में शायरी
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