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कुछ है घायल

( सतीशचंद चौरसिया द्वारा दिनाँक 19-05-2017 को प्रस्तुत )
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ये क्या है जो आँखों से रिसता है,
कुछ है भीतर जो यूं ही दुखता है,
कह सकता हूँ पर कहता भी नहीं,
कुछ है घायल जो यहाँ सिसकता है।

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