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क़ातिल से दोस्ताना

( केशपाल यादव द्वारा दिनाँक 01-08-2017 को प्रस्तुत )
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मिले न फूल तो काँटों से जख्म खाना है,
उसी गली में मुझे बार-बार जाना है,
मैं अपने खून का इल्जाम दूँ तो किसको दूँ,
लिहाज ये है कि क़ातिल से दोस्ताना है।

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