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क्या बेचकर हम खरीदें

( श्रीकांत दरने द्वारा दिनाँक 01-11-2017 को प्रस्तुत )
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क्या बेचकर हम खरीदें फुर्सत... ऐ जिंदगी,
सब कुछ तो गिरवी पड़ा है जिम्मेदारी के बाजार में।

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