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रुखों के चाँद

( एडमिन द्वारा दिनाँक 02-12-2017 को प्रस्तुत )
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रुखों के चाँद लबों के गुलाब माँगे है,
बदन की प्यास बदन की शराब माँगे है।

मैं कितने लम्हे न जाने कहाँ गँवा आया,
तेरी निगाह तो सारा हिसाब माँगे है।

मैं किस से पूछने जाऊं कि आज हर कोई,
मेरे सवाल का मुझसे जवाब माँगे है।

दिल-ए-तबाह का यह हौसला भी क्या कम है,
हर एक दर्द से जीने की ताब माँगे है।

बजा कि वज़ा-ए-हया भी है एक चीज़ मगर,
निशात-ए-दिल तुझे बे-हिजाब माँगे है।

~जाँ निसार अख़्तर

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