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उलझी हुई शाम

( पंकज पाल द्वारा दिनाँक 10-02-2018 को प्रस्तुत )
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उलझी हुई शाम को पाने की ज़िद न करो,
जो अपना ना हो उसे अपनाने की ज़िद न करो,
इस समंदर में तूफ़ान बहुत आते हैं,
इसके साहिल पर घर बनाने की ज़िद न करो।

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प्यार से प्यारी कोई मजबूरी नहीं होती,
अपनों की कमी कभी पूरी नहीं होती,
दिल से जुदा होना अलग बात है पर,
नजरों से दूर होना कोई दूरी नहीं होती।

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