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ज़ुल्म की इन्तेहा शायरी

( प्रीत द्वारा दिनाँक 16-12-2015 को प्रस्तुत )
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तुम अपने ज़ुल्म की इन्तेहा कर दो,
न जाने...
फिर कोई हम सा बेजुबां मिले ना मिले ।

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