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ज़िंदगी में इतने ग़म थे

( गुलकेश छावरी द्वारा दिनाँक 01-03-2019 को प्रस्तुत )
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कौन सा वो ज़ख्मे-दिल था जो तर-ओ-ताज़ा न था,
ज़िन्दगी में इतने ग़म थे जिनका अंदाज़ा न था,
'अर्श' उनकी झील सी आँखों का उसमें क्या क़ुसूर,
डूबने वालों को ही गहराई का अंदाज़ा न था।

~ अर्श सहबाई
ज़िंदगी में इतने ग़म थे शायरी
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