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फैज़ की दो लाईन हिंदी शायरी

( एडमिन द्वारा दिनाँक 09-01-2016 को प्रस्तुत )
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दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं,
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैं।
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तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं,
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।
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ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम,
विसाल-ए-यार फ़क़त आरज़ू की बात नहीं।
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दिल से हर मामला कर के चले थे साफ़ हम,
कहने में उनके सामने बात बदल गयी।
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है;
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
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आए तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबान,
भूले तो यूँ कि गोया कभी आश्ना न थे।
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तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं,
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।

~ फैज़ अहमद फैज़
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