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इश्क़ का जूनून

( एडमिन द्वारा दिनाँक 14-01-2016 को प्रस्तुत )
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फिर इश्क़ का जूनून चढ़ रहा है सिर पे,
मयख़ाने से कह दो दरवाज़ा खुला रखे।
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अकेले हम ही शामिल नहीं हैं इस जुर्म में जनाब,
नजरें जब भी मिली थी मुस्कराये तुम भी थे।
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लोग पूछते हैं कौन सी दुनिया में जीते हो,
अरे ये मोहब्बत है दुनिया कहाँ नजर आती है।

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