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आँखों के रूबरू आ जाओ

( एडमिन द्वारा दिनाँक 11-03-2016 को प्रस्तुत )
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आ भी जाओ मेरी आँखों के रूबरू अब तुम,
कितना ख्वावों में तुझे और तलाशा जाए।
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अल्फ़ाज़ चुराने की ज़रूरत ही ना पड़ी कभी,
तेरे बे-हिसाब ख्यालों ने बे-तहाशा लफ्ज़ दिए।
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आसान नही आबाद करना घर मोहब्बत का,
ये उनका काम हे जो ज़िदगी बरबाद करते हैं।
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तू घड़ी भर के लिए मेरी नज़रो के सामने आजा,
एक मुद्द्त से मैंने खुद को आईने में नहीं देखा।

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