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हिंदी में हिंदी उर्दू ग़ज़ल

तरकीब-ए-मुहब्बत पर...

ना गौर कर मेरे तरकीब-ए-मुहब्बत पर,
काबिल-ए-गौर हैं मेरी तहरीरें मुहब्बत पर।

यूं तो इश्क दो दिलों के हिफाजत का मसला है,
पर हो रकाबत, चलती है शमशीरें मुहब्बत पर।

ये आग सीने में लगती है, धुआं भी नहीं उठता,
जलते-बुझते रहें है कई सरफिरे मुहब्बत पर।

इश्क ने झिंझोड़े है कई बादशाहों के महल,
पर कायम रहें हैं कई छत शहतीर-ए-मुहब्बत पर।

बंदिशों का दस्तूर तो सदियों पुराना है मगर,
बंधती-टूटती रही है ये जंजीरें मुहब्बत पर।

यूं तो हो गए निकम्मे कितने आदमी काम के,
पर चमके हैं कई गालिब-मीरे मुहब्बत पर।

यूं तो दरिया है इश्क तैरते भी हैं सारे,
मगर रहते हैं प्यासे कितने जजीरे मुहब्बत पर।

संजीत पाराशर द्वारा दिनाँक 13.09.17 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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तेरी चाहत का वो मौसम...

तेरी चाहत का वो मौसम सुहाना याद आया है,
तेरा मुस्कुरा करके वो नजरें झुकाना याद आया है,

जो सावन की काली घटा सी छाई रहती थी,
उन जूलफों का चेहरे से हटना याद आया है,

तुझे छेड़ने की खातिर जो अक्सर गुनगुनाता था,
वो नगमा आशिकाना आज फिर याद आया है,

मेरी साँसें उलझती थी तेरे कदमों की तेजी में,
तेरा मुड़-मुड़ कर आना और जाना याद आया है,

तेरा लड़ना झगड़ना और मुझसे रूठ कर जाना,
वो तेरा रूठ कर खुद मान जाना याद आया है,

ना रस्ते हैं ना मंजिल है मिजाज भी है अावारा,
तेरे दिल में मेरे दिल का ठिकाना याद आया है,

जिसके हर लफज में लिपटी हुई थी मेरी कई रातें,
आज तेरा वो आखिरी खत हथेली पर जलाया है।

~ श्याम तनहा

श्याम तनहा द्वारा दिनाँक 03.09.17 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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ये लम्हा ये वक़्त...

काश ये लम्हा ये वक़्त यूं ही गुजर जाता,
तू सामने होती और वक़्त ठहर जाता...।

हम सोचते फिरते कि किसे अपना बना ले
हमें हर चेहरे में बस तू ही नजर आता...।

सारी दुनिया से बेवफाई करके ऐ जान,
मैं तुझे वफ़ा का सबक़ सुनाता...।

लोग कहते कि पागल सा हो गया है तू,
फिर भी तेरी यादों में हर वक़्त मुस्कुराता...।

क्या करूँ बहुत मजबूर हो गया हूँ तेरी मोहब्बत में
ऐ हसरत...
अब तो ख्वाबों का हर तारा मुझे टूटा नजर आता...।

मोहम्मद फैज़ अली द्वारा दिनाँक 12.06.17 को प्रस्तुत | कमेंट करें

प्यार का ये सिलसिला...

शुरू जो प्यार का ये सिलसिला नहीं होता,
ये रोग दिल को हमारे लगा नहीं होता।

मैं चाहता हूँ के एक पल को भूल जाऊं उसे,
मगर ख्याल है उनका जुदा नहीं होता।

कभी के मौत की बाँहों में सो गए होते,
हराम गर इसे मअबूत ने किया नहीं होता।

खुशी से ज़िंदगी अपनी भी काट गई होती,
वफ़ा के नाम पे धोखा अगर मिला नहीं होता।

वो कब्र पे मेरी दो अश्क ही बहा देते,
कसम खुदा की हमें फिर गिला नहीं होता।

कुछ और उनकी भी मजबूरियां रही होंगी,
यूँ ही तो कोई सनम बेवफा नहीं होता।

वो इस तरह से भुलाते ही क्यों हमें जाफर,
ख़राब गर ये मुक़द्दर मेरा नहीं होता।

-जाफर बिजनौरी

जाफर बिजनौरी द्वारा दिनाँक 30.05.17 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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जो की थी मोहब्बत...

हमने जो की थी मोहब्बत वो आज भी है,
तेरे जुल्फों के साये की चाहत आज भी है।

रात कटती है आज भी ख्यालों में तेरे,
दीवानों सी मेरी वो हालत आज भी है।

किसी और के तसब्बुर को उठती नहीं
बेईमान आँखों में थोड़ी सी शराफत आज भी है।

चाह के एक बार चाहे फिर छोड़ देना तू,
दिल तोड़ तुझे जाने की इजाजत आज भी है।

मनीष त्रिपाठी द्वारा दिनाँक 03.05.17 को प्रस्तुत | कमेंट करें

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