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Hindi Urdu Ghazal in Hindi

उसे चांदनी कहेंगे...


कभी दोस्ती कहेंगे कभी बेरुख़ी कहेंगे,
जो मिलेगा कोई तुझसा उसे ज़िन्दगी कहेंगे।

तेरा देखना है जादू तेरी गुफ़्तगू है खुशबू,
जो तेरी तरह चमके उसे रोशनी कहेंगे।

नए रास्ते पे चलना है सफ़र की शर्त वरना,
तेरे साथ चलने वाले तुझे अजनबी कहेंगे।

है उदास शाम राशिद नहीं आज कोई क़ासिद,
जो पयाम उसका लाए उसे चांदनी कहेंगे।

- मुमताज़ राशिद


एडमिन द्वारा दिनाँक 24.06.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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तक़रार क्या करूं...


जो कुछ कहो क़ुबूल है तक़रार क्या करूं,
शर्मिंदा अब तुम्हें सर-ए-बाज़ार क्या करूं,

मालूम है की प्यार खुला आसमान है,
छूटते नहीं हैं ये दर-ओ-दीवार क्या करूं,

इस हाल मे भी सांस लिये जा रहा हूँ मैं,
जाता नहीं हैं आस का आज़ार क्या करूं,

फिर एक बार वो रुख-ए-मासूम देखता,
खुलती नहीं है चश्म-ए-गुनाहगार क्या करूं,

ये पुर-सुकून सुबह ये मैं ये फ़ज़ा शऊर,
वो सो रहे हैं अब उन्हें बेदार क्या करूं।

- अनवर शऊर


एडमिन द्वारा दिनाँक 05.06.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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जवानी का मोड़...


लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं,
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं,

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ,
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं,

नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं बरसों से,
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं,

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए,
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं।

- राहत इंदौरी


एडमिन द्वारा दिनाँक 09.01.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें

आँखों में ख्वाब...


दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं,
सब अपने चेहरों पे दोहरी नका़ब रखते हैं,

हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे,
हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं,

बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आश्ना भी नहीं,
इसी में खुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं,

ये मैकदा है, वो मस्जिद है, वो है बुत-खाना,
कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं,

हमारे शहर के मंजर न देख पायेंगे,
यहाँ के लोग तो आँखों में ख्वाब रखते हैं।

- राहत इंदौरी


एडमिन द्वारा दिनाँक 09.01.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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हमसफ़र नही जाना...


बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये,
कि अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये।

करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला,
यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये।

मगर किसी ने हमें हमसफ़र नही जाना,
ये और बात कि हम साथ साथ सब के गये।

अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए,
ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये।

गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नहीं हारा,
गिरफ़्ता दिल है मगर हौंसले भी अब के गये।

तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो 'फ़राज़'
इन आँधियों में तो प्यारे चिराग सब के गये।



एडमिन द्वारा दिनाँक 27.10.15 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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