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हिंदी में हिंदी उर्दू ग़ज़ल

जिंदगी में दर्द सब...

जिंदगी में दर्द सब सहते रहे,
जो मिला था प्यार हम खोते रहे।

नफरतों के बीच नाजुक दिल मेरा,
तोड़ के वादे सभी चलते रहे।

बढ रही बेचैनियां मेरी यहाँ,
रात को तुम ख्वाब में आते रहे।

लौट आयी जिंदगी फिर से वहीं,
पेट की उस भूख से रोते रहे।

आँखों में छाया नशा है प्यार का,
इश्क में तेरे वफा मिलते रहे।

चाहतों के दरमियां इंतजार है,
भूलकर भी आज हम मिलते रहे।

रख लिया पत्थर दिलों में हमने भी,
दर्द की दास्तान को सुनते रहे।

(ओम नारायण)

ओम नारायण द्वारा दिनाँक 02.04.17 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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फूल से नाजु़क होंठों से...

इन फूल से नाजु़क होंठों से
गैरों की शिकायत ठीक नहीं,
बदनाम करें दिल वालों को ये
इनकी ये शरारत ठीक नहीं।

चंचल ये तेरे दो नैन मुझे
दिल का रोगी क्यों बनाते हैं,
तूने छेड़े हैं दिल में ख्वाब कई
तेरी इतनी नजाकत ठीक नहीं।

हर हाल में जीने मरने की
कसम उठा लेता है तू,
ऐ सुन ले मोहब्बत करने वाले
तेरी इतनी शराफत ठीक नहीं।

हर दिल को दवा मिल जाती है
और दिल को दुआ मिल जाती है,
दिल को जो कैद रखे ऐसे
चाहत की सिआसत ठीक नहीं।

अतुल सिंह मृदल

अतुल सिंह मृदल द्वारा दिनाँक 27.03.17 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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हर एक चेहरे पर...

हर एक चेहरे पर मुस्कान मत खोजो,
किसी के नसीब का अंजाम मत खोजो।

डूब चुका है जो गंदगी के दलदल में,
रहने दो यारो उसमें ईमान मत खोजो।

फंस गया है जो मजबूरियों की क़ैद में,
उसके दिल में दबे अरमान मत खोजो।

जो पराया था आज अपना है तो अच्छा,
उसमें अब वो पुराने इल्ज़ाम मत खोजो।

आदमी बस आदमी है इतना समझ लो,
हर किसी में अपना भगवान मत खोजो।

ये इंसान तो ऐबों का खज़ाना है "मिश्र",
उसके दिल से कोई, रहमान मत खोजो।

- शांती स्वरूप मिश्र

शांती स्वरुप मिश्र द्वारा दिनाँक 17.12.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें

दर्द हमको देने लगे...

जिसको दिल में बसाया हमने वो दूर हमसे रहने लगे,
जिनको अपना माना हमने वो पराया हमको कहने लगे।

जो बने कभी हमदर्द हमारे वो दर्द हमको देने लगे,
जब लगी आग मेरे घर में तो पत्ते भी हवा देने लगे।

जिनसे की वफ़ा हमने वो बेवफा हमको कहने लगे,
जिनको दिया मरहम हमने वो जखम हमको देने लगे।

बचकर निकलता था काँटों से मगर फूल भी जखम देने लगे,
जब लगी आग मेरे घर में तो पत्ते भी हवा देने लगे।

बनायीं जिनकी तस्वीर हमने अब चेहरा वो बदलने लगे,
जो रहते थे दिल में मेरे अब महलों में जाकर रहने लगे।

पुष्पेंद्र कुमार द्वारा दिनाँक 15.12.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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ख्वाब आँखों में...

ख्वाब आँखों में जितने पाले थे,
टूट कर के बिखर ने वाले थे।

जिनको हमने था पाक दिल समझा,
उन्हीं लोगों के कर्म काले थे।

पेड़ होंगे जवां तो देंगे फल,
सोच कर के यही तो पाले थे।

सबने भर पेट खा लिया खाना,
माँ की थाली में कुछ निवाले थे।

आज सब चिट्ठियां जला दी वो,
जिनमें यादें तेरी संभाले थे।

हाल दिल का सुना नहीं पाये,
मुँह पे मजबूरियों के ताले थे।

- अभिषेक कुमार अम्बर

अभिषेक कुमार अम्बर द्वारा दिनाँक 17.10.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें

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