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हिंदी में हिंदी उर्दू ग़ज़ल

वो बदल गए अचानक...

कभी मुझ को साथ लेकर, कभी मेरे साथ चल के,
वो बदल गए अचानक, मेरी ज़िन्दगी बदल के।

हुए जिस पे मेहरबाँ तुम, कोई ख़ुशनसीब होगा,
मेरी हसरतें तो निकलीं, मेरे आँसूओं में ढल के।

तेरी ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ के क़ुर्बाँ, दिल-ए-ज़ार ढूँढता है,
वही चम्पई उजाले, वही सुरमई धुंधल के।

कोई फूल बन गया है, कोई चाँद कोई तारा,
जो चिराग़ बुझ गए हैं, तेरी अंजुमन में जल के।

मेरे दोस्तो ख़ुदारा, मेरे साथ तुम भी ढूँढो,
वो यहीं कहीं छुपे हैं, मेरे ग़म का रुख़ बदल के।

तेरी बेझिझक हँसी से, न किसी का दिल हो मैला,
ये नगर है आईनों का, यहाँ साँस ले संभल के।

एडमिन द्वारा दिनाँक 27.10.15 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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शायरी से दिलचस्पी...

मेरी रातों की राहत, दिन के इत्मिनान ले जाना,
तुम्हारे काम आ जायेगा, यह सामान ले जाना।

तुम्हारे बाद क्या रखना अना से वास्ता कोई,
तुम अपने साथ मेरा उम्र भर का मान ले जाना।

शिकस्ता के कुछ रेज़े पड़े हैं फर्श पर चुन लो,
अगर तुम जोड़ सको तो यह गुलदान ले जाना।

तुम्हें ऐसे तो खाली हाथ रुखसत कर नहीं सकते,
पुरानी दोस्ती है, कि कुछ पहचान ले जाना।

इरादा कर लिया है तुमने गर सचमुच बिछड़ने का,
तो फिर अपने यह सारे वादा-ओ-पैमान ले जाना।

अगर थोड़ी बहुत है, शायरी से उनको दिलचस्पी,
तो उनके सामने मेरा यह दीवान ले जाना।

एडमिन द्वारा दिनाँक 27.10.15 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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सितारे न शमां न चांद...

ये हक़ीक़त है कि होता है असर बातों मे,
तुम भी खुल जाओगे दो-चार मुलक़ातों मे,

तुम से सदियों की वफाओं का कोई नाता न था,
तुम से मिलने की लकीरें थीं मेरे हाथों मे,

तेरे वादों ने हमें घर से निकलने न दिया,
लोग मौसम का मज़ा ले गए बरसातों में,

अब न सूरज न सितारे न शमां न चांद,
अपने ज़ख्म़ों का उजाला है घनी रातों मे।

एडमिन द्वारा दिनाँक 21.10.15 को प्रस्तुत | कमेंट करें

चमन में उदासी...

इस चमन में उदासी बनी रह गयी,
तुम न आये , तुम्हारी कमी रह गयी।
हसरतों में जिया फिर भी अफ़सोस है,
जुस्तजू दुआओं की बची रह गयी।
दिल जलाने से फुर्सत कहाँ थी उसे,
शम्मा जो थी बुझी वो बुझी रह गयी।
जो मिला था बसर के लिये कम न था,
पर ज़रूरत नयी कुछ लगी रह गयी।
पत्थरों के दिलों में नमी देखिये,
जो उगी घास थी वो हरी रह गयी।
जिस नज़र की हिमायत में तुम थे सदा,
वो नज़र तो झुकी की झुकी रह गयी।
ओस के चंद कतरों से होता भी क्या,
प्यास जैसी थी वैसी ही रह गयी।

एडमिन द्वारा दिनाँक 12.10.15 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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रात भर तन्हा...

जमाना सो गया और मैं जगा रातभर तन्हा
तुम्हारे गम से दिल रोता रहा रातभर तन्हा ।

मेरे हमदम तेरे आने की आहट अब नहीं मिलती
मगर नस-नस में तू गूंजती रही रातभर तन्हा ।

नहीं आया था कयामत का पहर फिर ये हुआ
इंतजारों में ही मैं मरता रहा रातभर तन्हा ।

अपनी सूरत पे लगाता रहा मैं इश्तहारे-जख्म
जिसको पढ़के चांद जलता रहा रातभर तन्हा ।

एडमिन द्वारा दिनाँक 11.10.15 को प्रस्तुत | कमेंट करें

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