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शाम बहुत तनहा है

( विशाल बाबू द्वारा दिनाँक 29-11-2017 को प्रस्तुत )
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ये शाम बहुत तनहा है मिलने की भी तलब है,
पर दिल की सदाओं में वो ताकत ही कहाँ है,
कोशिश भी बहुत की और भरोसा भी बहुत था,
मिल जायें बिछड़ कर वो किस्मत की कहाँ है।

~ विशाल बाबू
शाम बहुत तनहा है शायरी
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