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मर्जी से जीने की ख्वाहिश शायरी

( एडमिन द्वारा दिनाँक 15-01-2016 को प्रस्तुत )
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मर्जी से जीने की बस ख्वाहिश की थी मैंने,
और वो कहते हैं कि खुदगर्ज बन गये हो तुम।

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