Ahmad Faraz Shayari

Gam-e-Yaar Bhi Shamil Kar Lo...

Gam-e-Duniya Mein Gam-e-Yaar Bhi Shamil Kar Lo,
Nasha Barhta Hai Sharabein Jo Sharabon Mein Milein,
Ab Na Wo Main Hoon, Na Tu Hai, Na Wo Mazi Hai Faraz,
Jaise Do Saaye Tamanna Ke Saraabon Mein Milein.

ग़म-ए-दुनिया में ग़म-ए-यार भी शामिल कर लो,
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें,
अब न वो मैं हूँ, न तू है, न वो माज़ी है फ़राज़,
जैसे दो साए तमन्ना के सराबों में मिलें।

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Sheeshon Toota Na Karein...

लोग तो मजबूर हैं मरेंगे पत्थर,
क्यूँ न हम शीशों से कह दें टूटा न करें।

Log To Majboor Hain Marenge Patthar,
Kyoon Na Hum Sheeshon Se Keh Dein Toota Na Karein.

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आलम शौक़ का...

ये आलम शौक़ का देखा न जाये,
वो बुत है या ख़ुदा देखा न जाये,
ये किन नज़रों से तुम ने आज देखा,
कि तेरा देखना ​देखा ​ना जाये।

आलम शौक़ का शायरी

दर्द कैसा भी उठे...

ज़िक्र उस का ही सही बज़्म में बैठे हो फ़राज़,
दर्द कैसा भी उठे हाथ न दिल पर रखना।

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बदन में आग सी...

बदन में आग सी है चेहरा गुलाब जैसा है,
कि ज़हर-ए-ग़म का नशा भी शराब जैसा है,
इसे कभी कोई देखे कोई पढ़े तो सही,
दिल आइना है तो चेहरा किताब जैसा है।

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