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हिंदी में शिक़वा शायरी

हर रोज़ शिकायत...

मुमकिन हो आपसे तो भुला दीजिये मुझे,
पत्थर पे हूँ लकीर, मिटा दीजिये मुझे,
हर रोज़ मुझसे ताज़ा शिकायत है आपको,
मैं क्या हूँ, एक बार बता दीजिये मुझे।

हर रोज़ शिकायत शायरी

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जरा सा तुम बदल जाते...

जरा सा तुम बदल जाते, जरा सा हम बदल जाते,
तो मुमकिन था ये रिश्ते किसी साँचे में ढल जाते।

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पत्थर हूँ मैं...

पत्थर हूँ मैं... चलो मान लिया मैंने,
तुम तो हुनरमंद थे तराशा क्यूँ नहीं?

कोई दिल तोड़ जाता है...

इश्क़ में कोई किसी का दिल तोड़ जाता है,
दोस्ती में कोई दोस्त का भरोसा तोड़ जाता है,
ज़िंदगी जीना तो कोई उस गुलाब से सीखे,
जो खुद टूटकर दो दिलों को जोड़ जाता है।

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​क्या गिला करें...

​क्या गिला करें उनकी बातों का,
​क्या शिक़वा करें उन रातों से​​​,
​​कहें भला किसकी खता इसे हम​,
​​कोई खेल गया है मेरे जज्बातों से​।

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