Search Results for - सईद काज़िम अख्तर

मीठे लफ़्ज़ों में फरेब...

समझ जाता हूँ मीठे लफ़्ज़ों में छुपे फरेब को,
ज़िन्दगी तुझे समझने लगा हूँ आहिस्ता आहिस्ता।

लबों पे तेरा नाम...

रब से दुआ कर रहा था खुद के लिए,
बेसाख्ता लबों पे तेरा नाम आ गया।

पहलू में एक दर्द...

दिल के पहलू में एक दर्द सा पाने लगे,
जब अपने ही बेगाने से नजर आने लगे।

पिला दे साक़िया...

मौका मिला है कुछ तो ख़ुलूस दिखा दे साक़िया,
क्या पता... कल तेरी महफ़िल में हम हों कि न हों,
उठा के जाम अपने हाथों से पिला दे साक़िया,
क्या पता... कल तेरी महफ़िल में हम हों कि न हों।

तेरी महफ़िल में...

हम कब तक ग़ैरों की तरह तेरी महफ़िल में रहें,
अपना तो कहो झूठा ही सही हर बात गंवारा हो हो जाये।

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