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Shaakh Se Har Baar Toote

शाख से हर बार टूटे मगर उसूलों से जिंदगी जी है,
कांटे ही चुभे हर दफ़ा जब भी गुलों की आरज़ू की हैं,
अफ़सोस है मुझे अब भी उसी अब्र का,
जो छाया तो घटाओं सा पर बरसा अभी तक नहीं है।

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