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हिंदी में गरीबी पर शायरी

रुखी रोटी बाँट कर...

रुखी रोटी को भी बाँट कर खाते हुये देखा मैंने,
सड़क किनारे वो भिखारी शहंशाह निकला।

एडमिन द्वारा दिनाँक 07.05.17 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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रोशनी कच्चे घरों तक...

वो जिसकी रोशनी कच्चे घरों तक भी पहुँचती है,
न वो सूरज निकलता है, न अपने दिन बदलते हैं।

एडमिन द्वारा दिनाँक 27.11.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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वो राम की खिचड़ी...

वो राम की खिचड़ी भी खाता है,
रहीम की खीर भी खाता है,
वो भूखा है जनाब उसे,
कहाँ मजहब समझ आता है।

आर्यन वर्मा द्वारा दिनाँक 13.06.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें

गरीबों की औकात ना पूछो...

गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है,
इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है,
चेहरे कई बेनकाब हो जायेंगे,
ऐसी कोई बात ना पूछो तो अच्छा है।

खिलौना समझ कर खेलते जो रिश्तों से,
उनके निजी जज्बात ना पूछो तो अच्छा है,
बाढ़ के पानी में बह गए छप्पर जिनके,
कैसे गुजारी रात ना पूछो तो अच्छा है।

भूख ने निचोड़ कर रख दिया है जिन्हें,
उनके तो हालात ना पूछो तो अच्छा है,
मज़बूरी में जिनकी लाज लगी दांव पर,
क्या लाई सौगात ना पूछो तो अच्छा है।

गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है,
इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है।

करन वीर कवी द्वारा दिनाँक 06.06.16 को प्रस्तुत | कमेंट करें
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